गोविंद मिश्र की कहानियों में मध्यवर्गीय चेतना

 

अल्का1’ डाॅ. श्रीमती कृष्णा चटर्जी2

1शोधार्थी, शासकीय वि.या.ता.स्व. स्ना. महा. दुर्ग (..)

2सहायक प्राध्यापक, हिन्दी, शासकीय वि.या.ता.स्व. स्ना. महा. दुर्ग (..)

ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू सांण्तबींातंइवतजल/हउंपसण्बवउ

 

शोध सारांशः

गोविंद मिश्र कथा-साहित्य के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। सन् 1963 से वे लगातार सृजनशील है। ग्यारह उपन्यास, बीस कहानी संग्रह, छह यात्रा वृतांत, आठ निबंध, चार बाल साहित्य, दो आलोचनात्मक पुस्तकें एवं छह अनुवाद इत्यादि लिखकर आपने समकालीन हिन्दी कथाकारों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। बहुआयामी प्रतिभा के धनी गोविंद मिश्र ने अपनी रचनाओं में भारतीय समाज के बदलते परिदृश्य का बखूबी चित्रण किया है। पारिवारिक जीवन और स्त्री-पुरूष संबंधों का यथार्थ, टूटते परिवार और बिखरते मनुष्य, मानवीय संबंधों का अवमूल्यन, अंतरंगता की ललक, मध्यवर्गीय चेतना, आधुनिक नारी, शहर एवं कस्बे में सांस्कृतिक टकराव, टूटन की समस्याएँ, छटपटाती नैतिकता, मानवीय गर्माहट की खोज, स्वप्न भंग का यथार्थ, शासकीय तंत्र के तिलिस्म का पर्दाफाश इत्यादि विषयों पर आपने खूब लिखा। गोविंद मिश्र यशस्वी कथाकार है। हिन्दी कहानी में अपनी रचनाशीलता से आपने अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान अर्जित किया है। जब हिन्दी कहानी भांति-भांति के प्रयोगों से आक्रांत थी तब आपने जमीन से जुड़ी सच्चाइयों को अपनी रचनाओं में केन्द्रीयता दी। मानवीय मनोविज्ञान के अतल मैं उतरकर आपने उन जीवन सत्यों को उद्घाटित किया जिन पर स्थूल यथार्थ औपचारिकता, असमंजस, उपेक्षा आदि की धूल जम गई थी। समय के अनुरूप आपने विकासशील समाज के संघर्ष स्वप्न को अपनी रचनाओं में अभिव्यक्ति दी है।

 

ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू गोविंद मिश्रए मध्यवर्गीय चेतना

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रस्तावनाः

गोविंद मिश्र जी की कहानियाँ विभिन्न जीवन संदर्भो में गहरी मानवीय पीड़ा को चित्रित करती है। वे पीड़ितों के माध्यम से समाज में व्याप्त संवेदनहीनता और अमानुषिकता को अपनी कहानियों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। उनकी कहानियों में कहीं कहीं प्रतिरोध की चेतना भी दृष्टिगत होती है। वे जीवनानुभवों की रोशनी में अपनी कथाओं की पृष्ठभूमि और पात्रों का सृजन करते हैं। उनके पात्रों में बनावटीपन नहीं है। उनकी कहानियाँ मध्यवर्गीय समाज की विसंगतियाँ, असंतोष, स्वप्न, आशा निराशा इत्यदि त्रासदियों को रेखांकित करती है। आपकी अधिकांश कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन का यथार्थ चित्रण करती है यथा- वह दरियाई शहर, सतह की झाग, साजिश, नये पुराने माँ-बाप, उलझती टूटती चूड़ियाँ, दरियाई नाला और मुँह चांटती लहरें, रोता और ख्वाब देखता मुन्ना, उड़ते पेज बहकी बातें, ठहराव की ईंट, चैखटे, उपेक्षित, धांसू, शापग्रस्त, एक बूँद उलझी, बोझ, लहर, इजाजत नहीं, कैंपस, हवाबाज, अक्षम, यत्रधर्म, प्रेमसंतान, बेवजह, माइकल लोबो, सपने, कशिश, खूँटें, खुद के खिलाफ, खाक इतिहास, पगलाबाबा इत्यदि।

 

गोविंद मिश्र की कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन की विभीषिका के चित्र मिलते हैं। समकालीन हिन्दी कथाकारों में अपनी महत्वपूर्ण पहचान बनाने वाले गोविंद मिश्र उन थोड़े से तटस्थ लेखकों में से है, जो सभी तरह के सिद्धांतों में व्याप्तयूटोपियाको अस्वीकार करते हैं और आस्था तथा मानवीय मूल्य के अभाव में सार्थक जीवन, को असंभव मानते हैं।उलझती टूटती चूड़ियाँ मध्यवर्गीय जीवन की समस्याओं का बखान करती है- ‘‘कहने के लिए तो कुछ चाहिए था, सभी कुछ मिल गया है मुझे। फिर भी जैसे कुछ नहीं मिला बड़ा रीता-रीता सा महसूस किया करती हूँ। यह रीतापन घर में दौलत और बच्चों के बढ़ने के साथ-साथ और भी बढ़ता जाता है। जितना सोचा समझा है अपने आपकों उससे इसी निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि मुझे प्यार की भूख है।‘‘ मध्यवर्गीय सोच पर आधारित कहानीसतह की झागकहानी का उदाहरण दृष्टव्य है-‘‘अगर मैं होती तो इन उदास आंखों में कुछ हंसी खिलाने के लिए कुछ प्रयत्न करती। क्या यह भी एक खास तरीके की खुशी नहीं है।‘‘ मध्यवर्गीय पढ़ी लिखी स्त्रियाँ आधुनिकता के फेर में अपने पति का सम्मान नहीं करती। उन्हें अपने मित्रों से परिचय कराने में शर्म महसूस करती है- ‘‘आपकी कितनी चीजें बर्दास्त करनी पड़ती है। आप नहीं जानते अपने फ्रेण्ड्स के बीच कितना नीचा देखना पड़ता है मुझे। नये जूते क्यों नहीं लेते?‘‘ गोविंद मिश्र के अनुभवों का दायरा ज्यादातर महानगरीय मध्यवर्ग की भित्ति पर टिका हुआ है। अतः लेखक ने इस वर्ग की मूल्यगत पीड़ाओं को अपनी कहानियों के माध्यम से अभिव्यक्ति दी है।चैखटेएक सांकेतिक कहानी है। लेखक ने इस कहानी के माध्यम से जीवन के आपाधापी में व्यस्त मध्यवर्गीय जीवन की विभीषिका को रेखांकित किया है।

 

गोविंद मिश्र की चर्चित कहानीधांसूआज के यथार्थ को चित्रित करती कहानी है। इस कहानी में मानवीय अंतस की पीड़ा और व्यवस्था में दबे उसके नाना श्रोतों को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है।बहुधंधीयइसी दिशा में एक प्रयास है। यह कहानी भारतीय जीवन के हर क्षेत्र में उपस्थित उन बिचैलियों को लेकर लिखी गई है, जो सत्ता और सामाजिक अन्याय, अनाचार और उत्पीड़न के बीच व्यवस्थापक स्थायित्व का पोषण करते हैं- ‘‘मेरा असली ताल्लुक तो उस राजनीति से है जो आदमी को मारती है और वहाँ हर दल की मार एक सी है .........यहाँ तक की उन गैर दलीय आदमियों की भी, जो जनता की सेवा के विकास से पीड़ित होने के कारण तंत्र की मार मारते हैं।‘‘ इसी संदर्भ में डाॅ. सुधीर चंद्र लिखते है-‘‘समाज में व्याप्त विकृतियाँ बार-बार उभरकर आती है जो विशेषकर बेईमानी और भ्रष्टाचार और इनसे त्रस्त आम आदमी की बेबसी उभारते हैं।‘‘ मिश्र जी की कहानीशापग्रस्तमें भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति का चित्रण है इस कहानी में अपनी महत्वाकांक्षाओं के कारण ही स्त्री ग्यारह वर्ष तक साथ रहने के बाद अपने पति को छोड़ देती है। देखा जाए तो बाहरी चमक-दमक और ऐशो आराम प्रिय स्त्रियाँ चंद पैसों के लोभ में अपना भरा-पूरा परिवार त्याग देती है। मानवीय मूल्यों के अभाव में आज जीवन खोखला होता जा रहा है। बच्चे बड़े सभी मानसिक द्वन्द से ग्रसित है। वे उचित अनुचित की विवेचना ही नहीं करते।

 

दाम्पत्य प्रेम की यथार्थता को चित्रित करती गोविंद मिश्र की कहानीएक बूंद उलझीमध्यवर्गीय जीवन की व्यथा-कथा पर आधारित है। औद्योगिकीकरण के इस युग में लोगों की यह धारणा है कि पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है। गलत साबित होता है। जीवन यथार्थ से टकराकर स्वप्नभंग होते कथानायक की स्थिति दृष्टव्य है - ‘‘एक मुकाम पर पहुँचकर कैसी निकल आती है जिंदगी.............फटेहाल, जियो तो कुछ नहीं, मर जाओं तो कुछ नहींः किस तेजी से सब चीजे एक साथ दगा दे गई - बीवी, शराब, नींद, भूख सभी। रह गया सिर्फ चोला।‘‘ इसी तरह गोविंद मिश्र नेबोझनामक कहानी में मध्यवर्गीय स्त्री की सोच को रेखांकित किया है। इस कहानी में पति-पत्नी पर और पत्नी-पति पर शक करती है। अंततः अपने दो नन्हें-नन्हें बच्चों को छोड़कर पत्नी आत्महत्या कर लेती है। भावुकता से लिया गया निर्णय कभी-कभी गलत साबित हो जाता है। मिश्र जी नेलहरनामक कहानी में इसी तथ्य को रेखांकित किया है। इस कहानी की नायिका रश्मि पति के मार के डर से उससे तलाक ले लेती है और सर्वेश नामक युवक से विवाह कर लेती है परन्तु यहाँ भी उसे धोखा ही मिलता है क्योंकि सर्वेश कू्रर नहीं चालाक था। पुरूष की मानसिकता को उजागर करता यह उदाहरण दृष्टव्य है - ‘‘एक बार विवाह हो गया तो लड़की लाख पढ़ी-लिखी हो कमाऊ हो, आत्म निर्भर हो सबसे पहले वह गृहस्थित है। जिसे पति घर और बच्चों के लिए होम होना ही है। उसकी अपनी जिंदगी कुछ नहीं।‘‘ पश्चाताप की अग्नि में जलती नायिका रश्मि अंततः कुछ उठती है- ‘‘मैं सोच भी नहीं सकती थी कि ऐसे भी बातें की जा सकती है किसी के साथ  .........इतने कोमल ढंग से। इतनी करूणा से जीवन के बारे में किसी ने नहीं समझाया........ मैं जीना सीख रही हूँ।‘‘

 

कुछ लोगों की जिंदगी ऐसी होती है कि उन्हें मरते दम तक काम करना पड़ता है। चाहकर भी वे आराम की जिंदगी नहीं जी पाते। परिस्थितियाँ उन्हें काम करने पर मजबूर कर देती है। ऐसी ही स्थितिइजाजत नहींनामक कहानी के नायक कैलाश बाबू की है। इसी तरह मिश्र जी की कहानीहवाबाजजीवन की सच्चाईयों को सोच में बदल देती है- ‘‘जिंदगी जो जीना है उसे हम भूलते जा रहे हैं, उलझे ज्यादा रहते हैं। तुमने एक बात नोट की है .....अब कम लोग ठहाके मारकर हँसते दिखाई देते हैं।‘‘ महानगरीय सोच पर आधारित इस कहानी में माता-पिता के विरूद्ध बेटी पुलिस स्टेशन में शिकायत लिखवाती है। तब माता-पिता को लगता है कि उनकी परवरिश में कहीं--कहीं कमी रह गई है- ‘‘लाड़ प्यार से पाली गई अपनी बच्ची को अपनी आँखों के सामने धीरे-धीरे काॅल गर्ल बनते देख रहे हैं, कुछ नहीं कर सकते।‘‘ इसी तरहसाधेंकहानी में पुरानी और नई पीढ़ी मध्यवर्गीय परिवार अपने बच्चों की खुशी के लिए जी जान लगा देते हैं वे उनकी हर छोटी से छोटी खुशियों के लिए अपना सब कुछ दाँव लगाने को तत्पर रहते हैं। परन्तु वही संतान बड़ा होकर अपने माता-पिता की आशाओं - आकांक्षाओं के साथ खिलवाड़ करता है।अक्षमकहानी में मिश्र जी ने संतान की माता-पिता के प्रति सोच को दर्शाया है। डाॅक्टर पुत्र माता-पिता के प्रेम को अंत तक समझ सका। इस तरह गोविंद मिश्र की अनेक कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन का यथार्थ चित्रित है।

 

गोविंद मिश्र एक सधे हुए कथाकार है। उनकी कहानियाँ पाठक को बार-बार आकर्षित करती है। उनकी हर एक कहानियों का विषय पृथक होता है। वर्तमान मशीनीकरण के इस युग में मानव ने उन्नति के अनेक सोपान पार कर लिए हैं परन्तु मध्यवर्गीय सोच एवं मध्यवर्गीय स्त्री की स्थिति में आज भी विशेष परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ता। मिश्र जी यथार्थवादी कथाकार हैं उन्होंने जीवन को करीब से देखा है। तभी तो उनकी कहानियाँ कभी अपनी तो कभी हमारे आसपास की कहानी प्रतीत होती है। आज परिवार में पति और पत्नी के अहं का टकराव और एक-दूसरे के प्रति मन में बढ़ता जा रहा संशय आधुनिकता और परंपरा के टकराव का फल है। ‘‘कोई फर्क नहीं पड़ता अगर वे दोनों अपने-अपने ढंग से जिये.........लेकिन फिर कहीं कोई फर्क पड़ने लगता है जो दोनों को एक-दूसरे से मानसिक स्तर पर दूर हटाता है।‘‘ अंतद्र्वन्दों के चित्रण में मिश्र जी को कमाल हासिल है। तत्सम भाषा के साथ बोलचाल और मुहावरेदार भाषा का प्रयोग गोविंद मिश्र की सृजनात्मकता की विशेषता है। उनके कथा-साहित्य का देशज चरित्र उनकी शक्ति है। तभी तो शैलेष मटियानी ने लिखा है - ‘‘गोविंद मिश्र अपनी पीढ़ी के सबसे महत्वपूर्ण कहानीकार हैं क्योंकि भाषा और कथ्य दोनों धरातलों पर उनके यहाँ अपेक्षाकृत ज्यादा विस्तार है बल्कि कहना तो यहाँ तक चाहूँगा कि अपनी पीढ़ी में भाषा और संवेदना के स्तर पर प्रेमचंद के सबसे निकट गोविंद मिश्र ही दिखाई पड़ते हैं। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि गोविंद मिश्र समकालीन कथाकारों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। उनकी अधिकांश कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन की विडंबना एवं मध्यवर्गीय चेतना के दर्शन होते हैं।

 

ग्रंथ सूची:

1.            दवे रमेश, आकलन गोविंद मिश्र, अमन प्रकाशन कानपुर.

2.            वांदिवडेकर चंद्रकांत, गोविंद मिश्र: सृजन के आयाम, वाणी प्रकाशन.

3.            वर्मा भगवानदासः गोविंद मिश्र की रचनाशीलता, वाणी प्रकाशन.

4.            मुंडेलक्ष्मण, गोविंद मिश्र का कथा साहित्य, विद्या प्रकाशन.

5.            मिश्र गोविंद, कहानी समग्र, भाग- 1, 2, 3 किताब घर प्रकाशन नई दिल्ली.

 

 

 

 

Received on 11.11.2018                Modified on 28.11.2018

Accepted on 10.12.2018            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(4):551-553.